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नई दिल्ली : वंदे मातरम ट्रेन को हरी झंडी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ही दिखाते आए हैं, देश में नोट बंदी से लेकर दो हजार रुपए बंद करने तक का फैसला उनका है, जो मन में आता है कर देते हैं, देश की संपत्तियां भी बेच रहे हैं, यह किसी से छिपा भी नहीं है, फिर कहते हैं देश में पिछले 70 साल मे कुछ नहीं हुआ।

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उनके दूसरे कार्यकाल में रेल हादसे में 280 मौत हो गयी, मगर चुप हैं, रेल मंत्री भी इस्तीफा नहीं दिये, विपक्ष में होते तो मोदी इस्तीफा के लिए पूरे देश में बीजेपी को धरने के लिए उतार देते।

लाल बहादुर शास्त्री 1958 में रेल मंत्री थे, आन्ध्र प्रदेश के महबूबनगर में एक रेल हादसा में 112 लोगों की मौत हो गयी थी, नैतिकता के आधार पर उन्होंने इस्तीफा पीएम नेहरू को दे दिया था, उनका इस्तीफा नेहरू नहीं स्वीकारे,
इसके बाद तमिलनाडु के अरियालुर में एक रेल में 144 लोगों की मौत पर नेहरू को लालबहादुर शास्त्री ने इस्तीफा भेज दिया था।

इतिहास गवाह है कईयों ने इस्तीफा दिया..

तीस सांसदो ने नेहरू को कहा शास्त्री जी के इस्तीफे की सराहना की जानी चाहिए, न कि उनका इस्तीफा स्वीकारें, हालांकि नेहरू ने शास्त्री का इस्तीफा स्वीकारने राष्ट्रपति को पत्र भेज दिया था, नीतीश कुमार ने भी 1990 में असम में गैसल ट्रेन दुर्घटना की जवाबदारी लेते हुए इस्तीफा दे दिया था, तब 290 लोगों की मौत हुई थी, ममता बनर्जी ने सन् 2000 में दो ट्रेन दुर्घटना में इस्तीफा दे दिया था, लेकिन उस समय पीएम रहे अटल जी ने उनका इस्तीफा नहीं स्वीकारे थे, एनडीए सरकार में रेल मंत्री रहे सुरेश प्रभु ने 2017 में दो रेल हादसे पर इस्तीफा दे दिया था, पीएम मोदी ने नहीं स्वीकारा।

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सिर्फ 34 हजार करोड़..
मोदी ने देश के उद्योगपतियों को ग्यारह लाख करोड़ रुपए माफ कर सकते हैं, लेकिन देश की रेल व्यवस्था में हादसे न हो इसके लिए एक पैसा खर्च नहीं कर सकते, जबकि मात्र 34 हजार करोड़ रुपए में रेल हादसे रोके जा सकते हैं, एक किलोमीटर के लिए तीस लाख रुपए खर्चा आयेगा, रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव ने 2012 में बताया था कि कवच के जरिये ब्रेक लग जाएगा और रेल हादसे नहीं होंगे, देश में एक लाख 15 हजार किलोमीटर रेल पटरियां है, यानी करीब 34 हजार करोड़ खर्चा आएगा, जबकि देश से दो लाख करोड़ लेकर कई उद्योगपति भाग गए हैं।

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देश में एक बड़ी त्रासदी देखी जा रही है, और यह त्रासदी तब देखी जाती है जब चुनाव आता है, गौर करे, इसके पहले भी कई बड़ी त्रासदी भारत चुनाव के पहले झेल चुका है, पुलवामा हमला शायद ही कोई व्यक्ति भूला हो, और अब एक बड़ा रेल हादसा, कैसे हो गया, क्या जान बूझकर कराया गया, यह समझ से परे है।


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